भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक फैशन की चीजें पॉपुलर हुई हैं, जिसकी दीवानी पूरी दुनिया है। इसी फैशन की दीवानगी में एक नाम आता है पटोला साड़ी का। आपने हाल फिलहाल वह गाना तो सुना ही होगा ‘तू निकले पटोला बनके…’

जाहिर तौर पर यह पॉपुलर गाना ‘पटोला‘ शब्द को आपके दिमाग में अंकित कर गया होगा। पर असल में यह शब्द पंजाब की बजाय गुजरात के हथकरघा उद्योग से निकला है। जी हां गुजराती हस्तकला में ही पटोला साड़ियां बनती हैं और इसकी खासियत यह है कि इनकी नकल आप नहीं कर सकते अन्यथा आप को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। आइए जानते हैं इसके बारे में।

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पटोला साड़ी का एक समृद्ध इतिहास रहा है। ग्यारहवीं सदी में सोलंकी शासक ‘राजा भीमदेव’ की पत्नी ‘रानी उदय मती’ अपने समय में बेहद खूबसूरत और फैशन आईकॉन थीं। बाद में उनका देहांत हुआ और राजा भीमदेव ने रानी की बाव नामक बावड़ी का निर्माण कराया। आप इस बावड़ी की खूबसूरती इसी से जान लीजिए कि यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया है।

तकरीबन 64 मीटर लंबी, 27 मीटर गहरी और 20 मीटर चौड़ी इस बाव को अपने आप में खास माना जाता है। इसकी नक्काशी में मजदूरों को कई सालों का समय लगा था। अब आप कहेंगे कि मैं इस बावड़ी का वर्णन यहां क्यों कर रहा हूं तो यह जान लीजिए कि पटोला साड़ियों की नक्काशी इसी बाव की नक्काशी से मिलती जुलती है।

पटोला साड़ियों पर चार आकृतियों को नक्काशी वाली स्टाइल में बनाया जाता है। खास बात यह है की राजतंत्र में केवल रानियां और राजकुमारियां ही यह डिजाईन अपनी साड़ी पर बनवा सकती थीं। बाद में तकरीबन 250 बुनकरों ने पटोला साड़ी की कला को आगे बढ़ाया। हालांकि उन्होंने इस राज को खोला नहीं और पटोला साड़ी की निर्माण-विधि को खुद तक सीमित रखा।

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आप इस साड़ी की खासियत यूं ही समझ लीजिए कि 2 मजदूर 4 से 5 महीने में मात्र एक साड़ी बना पाते हैं। इसमें हाथी, पीपल की पत्ती, नर्तकी, जल में उगने वाले पौधे, टोकरी, सज्जा, दोहरी रेखाओं इत्यादि के साथ बनने वाली पटोला साड़ी एक निश्चित क्रम में बनाई जाती है।

यह भी खास बात है कि अगर आप पटोला साड़ी पहनना चाहते हैं तो 2 साल से पहले आपको इसका ऑर्डर देना पड़ता है और आपको कई बार तो 3 साल से अधिक का वेटिंग पीरियड भी मिलता है। इसकी खासियत यूं ही समझ जाईये कि डब्ल्यूटीओ में जी आई नंबर के द्वारा यह रजिस्टर्ड है। इसका मतलब है कि कोई इसका नकल नहीं कर सकता है।

इसकी कीमत भी अपने आप में खास होती है। इसकी कम से कम साड़ी आपको डेढ़ लाख रुपए तक में मिलेगी, जबकि साड़ी की अधिकतम कीमत ₹500000 तक है। अधिकतर इसके ग्राहक विदेशी ही होते हैं। हालांकि यह साड़ी मजबूत भी बहुत होती है और इसे आपके परिवार की कई पीढ़ियां पहन सकती हैं।

कहते हैं कि 100 साल तक यह साड़ी फटती नहीं है और ना ही इसका कलर फेड होता है। पटोला साड़ी पर ₹5 का एक डाक टिकट भी जारी किया गया है और इसके बुनकरों को राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है।

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पाटन शहर में एक म्यूजियम बना है जिसमें पटोला साड़ियों का इतिहास बताया गया है। निश्चित रूप से भारत की बेहद मशहूर कला को आगे भी जारी रहना चाहिए।

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