कोल्हापुरी चप्पल पहनना लोग अपनी शान समझते रहे हैं। ना केवल पुरुष बल्कि महिलाओं में भी इसका अच्छा खासा क्रेज रहा है। इसका क्रेज कई सौ साल पहले से हाल-फिलहाल तक कायम रहा था। ऐसे में लाइफ स्टाइल में खास स्थान रखने वाली कोल्हापुरी चप्पल के बारे में जानना बेहद रोमांचक है।

सच कहा जाए तो तेरहवीं शताब्दी से ही कोल्हापुरी चप्पल का चलन शुरू हो गया था। बाद में यह पीढ़ी गत रूप से आगे बढ़ता रहा। व्यापारिक दृष्टि से 18वीं शताब्दी में यह महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर शुरू हुआ, तब इसे पायदान, बक्कल, नाली, पुकारी, कपास इत्यादि नाम से पुकारा जाता था। इतने सारे नामों के पीछे लॉजिक क्या था कि जिस जिस गांव में यह चप्पल बनता था उसे वहीं के नाम से पुकारा जाता था और यह एक तरह से ब्रांडिंग टेक्निक थी।

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तब मजे हुए कारीगरों ने बेहद टिकाऊ चप्पल बनाने में सफलता अर्जित की थी, जिसमें मोटा सोल प्रयोग में लाया जाता था। जाहिर तौर पर इसमें बीफ, भैंस, बैलों के चमड़े इत्यादि का प्रयोग किया जाता था।

चप्पल का कोल्हापुरी नाम पड़ने के पीछे भी एक कहानी है। कई गांव में से एक गांव कोल्हापुर था और पांडू राम पाखरे नामक व्यक्ति ने पहली बार इस चप्पल को मुंबई में इंट्रोड्यूस किया था। यह बात 1920 की है, तब इस परिवार ने जेजे एंड संस शूज नामक दुकान के मालिक को कोल्हापुरी चप्पल दिया और धीरे धीरे मांग बढ़ने लगी।

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जाहिर तौर पर फिर यह कोल्हापुरी के नाम से ही मार्केट में फैल गई और यह क्रेज आज भी है बना हुआ है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि जो चमड़ा चप्पलों में प्रयोग होता है उनका अधिकतर हिस्सा चेन्नई और कोलकाता से मंगाया जाता है। बाद में बकरों तक का चमड़ा इन चप्पलों में प्रयोग किया जाने लगा। खास बात यह है कि मार्केट में कई कलर के कोल्हापुरी चप्पल उपलब्ध हैं। इनमें कई तो कढ़ाईदार चप्पलें भी हैं।

कोल्हापुरी चप्पल ने अपना स्थान बना कर रखा है और यह सिंगापुर, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में निर्यात की जाती है। खास बात यह है कि बदलते फैशन ट्रेंड के अनुसार यह चप्पल आउटडेटेड नहीं हुई। जितना इसे धोती कुर्ता, पायजामा कुर्ता पर पसंद किया जाता है उतना ही जींस पर भी यह खिलता है।

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वहीं महिलाएं सलवार सूट के अलावा साड़ियों इत्यादि पर भी इसे पहनती हैं। खास बात यह है कि अमीर गरीब सभी के बजट में यह चप्पल आ जाती है। मुश्किल यह है कि एक से बढ़कर एक देसी विदेशी मार्केट में जबरदस्त ढंग से पैसा झोंक देते हैं। ऐसी स्थिति में इस कला पर खतरा आना स्वाभाविक ही है।

कोल्हापुरी के बारे में आपकी क्या राय है?

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